वाह कुदरत के करिश्मे
खूब तेरी होशियारी
उत्तर से दक्षिण
पूरब से पश्चिम
तेरी ही बस्ती
तेरे ही नियम
तेरी ही चर्चा
तेरे ही परचम
तूने बुना जो ताना
बाना
तेरी क़ौम पनप गयी
तेरी आबादी बढ़ी
तेरी नगरी बनी
अब तेरा ही रुतबा
तेरा ही ख़ौफ़
तेरा ही जीवन
तेरा ही शौक
फन को तेरे सलाम
तूने अंतरिक्ष को भी
नापा
वक़्त की भट्टी में
तप
निचोड़ा कुदरत
का ज्ञान
तेरी रूह बड़ी प्यासी
नित करती आविष्कार
पर क्यूँ इतराने लगा
फसाना अभी बाकी है
इशतहारों के दौर में
जमूरियत भी बाज़ार
है
तू एक मशीन है
तू एक दुकान है
कितनी भी सौदेबाज़ी
कर
सब यहीं रह जाएगा
वक़्त की आँधी में
तेरी छत भी उड़ जानी
ये सोच क्या छोड़ जाएगा
बारी तो हे तेरी भी
आनी
तेरी ही क़ौम बंब बनाती
तेरी ही क़ौम लकीर
खीचती
तेरी ही क़ौम खून बहाती
तेरी ही क़ौम भेद करती
तू बट गया
क्या तेरी हुकूमत
अगर खुश है सौदा करके
तो तेरा जीना बेईमानी
है
क्या शुक्र करूँ तेरा
सड़कों पर अब भी ग़रीबो
के बिस्तर बिछते हैं
अब भी लोग भूखे मरते
हैं
बेकार हैं आविष्कार
गर जिंदगी अभी भी जूझ
रही
पैसे की हुकूमत है
चलती
तू भी रोज़ है बिकता
कुदरत तेरी क्या मज़ाल
हमने तो लाशों के ढेर
पर भी बस्ती बना ली
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