Thursday, July 24, 2014

कुदरत तेरी क्या मज़ाल

वाह कुदरत के करिश्मे
खूब तेरी होशियारी
उत्तर से दक्षिण
पूरब से पश्चिम
तेरी ही बस्ती
तेरे ही नियम
तेरी ही चर्चा
तेरे ही परचम
तूने बुना जो ताना बाना
तेरी क़ौम पनप गयी
तेरी आबादी बढ़ी
तेरी नगरी बनी
अब तेरा ही रुतबा
तेरा ही ख़ौफ़
तेरा ही जीवन
तेरा ही शौक
फन को तेरे सलाम
तूने अंतरिक्ष को भी नापा
वक़्त की भट्टी में तप
निचोड़ा कुदरत का ज्ञान
तेरी रूह बड़ी प्यासी
नित करती आविष्कार
पर क्यूँ इतराने लगा
फसाना अभी बाकी है
इशतहारों के दौर में
जमूरियत भी बाज़ार है
तू एक मशीन है
तू एक दुकान है
कितनी भी सौदेबाज़ी कर
सब यहीं रह जाएगा
वक़्त की आँधी में तेरी छत भी उड़ जानी
ये सोच क्या छोड़ जाएगा
बारी तो हे तेरी भी आनी
तेरी ही क़ौम बंब बनाती
तेरी ही क़ौम लकीर खीचती
तेरी ही क़ौम खून बहाती
तेरी ही क़ौम भेद करती
तू बट गया
क्या तेरी हुकूमत
अगर खुश है सौदा करके
तो तेरा जीना बेईमानी है
क्या शुक्र करूँ तेरा
सड़कों पर अब भी ग़रीबो के बिस्तर बिछते हैं
अब भी लोग भूखे मरते हैं
बेकार हैं आविष्कार
गर जिंदगी अभी भी जूझ रही
पैसे की हुकूमत है चलती
तू भी रोज़ है बिकता
कुदरत तेरी क्या मज़ाल

हमने तो लाशों के ढेर पर भी बस्ती बना ली

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